सावरकर साहब ने बहुत सोच-समझकर अपनी राजनीतिक विचारधारा को हिन्दुत्व के नाम से सम्बोधित किया, ताकि जब भी हिन्दू धर्म की आलोचना की जाये, तो हिन्दुओं को लगे कि हिन्दू धर्म की आलोचना की जा रही है. सायद यह लोग समझ नहीं पते हिन्दुत्व वास्तव में हिन्दू धर्म का नहीं, हिन्दू राष्ट्रवाद का दस्तावेज प्रमाण है, जिसे कीसी भी लोकतांत्रिक संविधान के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता.
कृष्ण प्रताप सिंह -19 November, 2021 08:00 am IST
आरएसएस के कार्यकर्ताओं की फाइल फोटो, प्रतीकात्मक तस्वीर: विकीमीडिया कॉमंस.
यह बिलकुल साफ है की इसे विडम्बना छोड़ कुछ नहीं कहा जा सकता क्यों कि जहां इस समय हिन्दू धर्म को अपने समाज सुधार के लिए व्यापक आन्दोलन गुजर रहा है, वही दूसरी तरफ उसे हिन्दुत्व नाम की उस राजनीतिक विचारधारा से उलझना पड़ रहा है, जिसके प्रवर्तक है हिन्दू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर साहब जी ने पहले ही अपनी किताब हिंदुत्व- हू इज ए हिन्दू में खुद लिख गये हैं कि उसका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और जो न सिर्फ खुद को हिन्दू धर्म से ऊपर कभी नहीं मानी है बल्कि उसे भूगोल, रक्त, देश और इतिहास वगैरह से जोड़कर सीमित व हीन भी बनाती रही है.
इस बात को ठीक से समझने के लिए उसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माननीय राहुल गांधी की हिन्दू धर्म व हिन्दुत्व में फर्क या सलमान खुर्शीद द्वारा अपनी ‘सनराइज ओवर अयोध्या’ शीर्षक पुस्तक में हिन्दुत्व की आईएसआईएस व बोकोहरम जैसे जातिवादी संगठनों से तुलना वाली टिप्पणियों से अलग करना होगा और इस मर्म तक जाना होगा कि जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं, वह अतीत में उसे जड़ बना डालने की तमाम कोशिशों के बावजूद सतत प्रवहमान रह सका तो सामाजिक सुधार के आन्दोलनों की लम्बी परम्परा के ही कारण. यह परम्परा नहीं होती तो हिन्दू धर्म में पैठ बना चुकी सती और कन्या वध जैसी अनेक दारुण कुरीतियों का उन्मूलन संभव ही नहीं होता और वे उसके पांवों की चक्की बनी रहतीं.
ऐसे आन्दोलनों के अवसान की ही दें है कि विविधता को सहजतापूर्वक स्वीकार करने की हिन्दू धर्म की परम्परा साथ आज जीवन्त के बजाय जड़ होती दिखाई देने लगी है और उसकी जगह पदानुक्रम व असमानता जैसे तत्व संस्थागत रूप पा गये हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो यही कारण है कि उसके अनेक अनुयायी 21वीं सदी में भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं समझते, उन्हें अपनी पसन्द का जीवन साथी चुनने तक के अधिकार से वंचित रखना चाहते हैं,महिलाओ का उत्पीड़न साथ ही पुरुषों को पितृसत्तावादी मान्यताएं व विचार नहीं बदलने देते,लोग ऐसी पुरानी परम्पराओं में उलझ कर रह गए है संविधान के शासन के सात दशकों बाद भी कई जातियों को अनौपचारिक तौर पर दलित, वंचित और अछूत बनाये हुए हैं जाती और धर्म का सैलाब बाह रहा है और जब भी चुनाव आते हैं,तो ये राजनितिक पार्टिया उन्हें हर हाल में जातियों के युद्ध में बदल देते हैं. इतना ही नहीं, कुछ जातियों को हमेशा बाकियों से ज्यादा महत्व देकर सिर पर बैठाये रखते हैं जैसे ब्राम्हण को और शेष जातियों जैसे अनुसूचित जाती, अनुसुचित जनजाति,और पिछडो को हाशिये पर डाले रखते हैं
ऐसे में किसी भी शिक्षित व्यक्ति को यह देखकर दुःख ही होगा कि यहाँ जो चल रहा है इस स्थिति को बदलने के लिए हिन्दू धर्म या समाज के भीतर से किसी पहल के दूर-दूर तक कोई आशा की किरण नहीं दिख रही फिर भी उसकी खुशी का कम से कम एक वायस (वजह) है कि इस धर्म ने अभी भी बहुत हद तक अपने उन तत्वों को बचाए रखा है, जिनके मद्देनजर कई विचारक उसे धर्म के बजाय जीवन पद्धति के रूप में देखते हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल यह है कि उसका हिन्दू नाम भी ‘दूसरों’ का दिया है और उसको अंगीकार किये रखने में उसे कभी कोई परेशानी नहीं होती.
जब की आज नये जमाने के कई हिन्दुत्ववादी अपनी राजनीति की सुरक्षा के लिए यह तो चाहते हैं कि सारे हिन्दू गर्व से अपने हिन्दू होने का ऐलान किया करें, लेकिन खुद को उसके ‘बड़प्पन’ का वारिस नहीं सिद्ध कर पाते. उलटे अपने देवताओं व पूजा-पद्धतियों के चुनाव की हिन्दुओं की स्वतंत्रताएं छीन लेना चाहते हैं और एक संस्था के आदेशों के अनुपालन व अनुशासन के प्रति समर्पण की अपनी खास कसौटियों के तहत हिन्दुत्ववादी बना देना चाहते हैं.
आज इन शब्दों पर बहस हो रही है.हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवाद. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में हिंदू को हिंदुत्व से अलग बताया है
समझिए आरएएस विचारक राकेश सिन्हा और गांधीवादी विचारक तुषार गांधी से - इन शब्दों या मान्यताओं में क्या समान है और क्या फ़र्क़ है?
राकेश सिन्हा क्या कहते है |
राकेश सिन्हा जी कहते कि हिंदू अस्तित्व की पहचान है कि आप अपनी आस्था से, जन्म से, मन से हिंदू हैं. लेकिन अपनी पहचान के प्रति सजग होना और उसके प्रति चेतना का विकास होना हिंदुत्व है.
अर्थात पहचान से हिंदू होने का तात्पर्य है कि क्षमाभाव, प्रेमभाव और आचरण की शुद्धता होना, अहिंसा के रास्ते पर चलना और विविधता को महत्व देना.
हिंदू शब्द भाववाचक है. इसे हम संज्ञा नहीं मानते हैं. जब हम कहते हैं हिंदू तो उसका मतलब होता है विविधता को महत्व देना. ये विविधता कृत्रिम नहीं है, ये हिंदू के अंतरमन में बैठी हुई है. विविधता के बिना हिंदू शब्द की कल्पना करना अर्थहीन है.हिंदू होने की इन सभी विशेषताओं के प्रति सजग होना, इनका क्षरण ना होने देना हिंदुत्व है. भले ही हिंदुत्व शब्द प्रचलित विनायक दामोदर सावरकर जी की पुस्तक से हुआ लेकिन सावरकर जी हिंदुत्व के पहले या अंतिम विचारक नहीं है. वो विचारकों की श्रृंखला में एक विशिष्ट समय के विचारक हैं.
महापुरुष - रविदास, जिन्होंने हिंदुओं को अपनी आंतरिक चुनौतियों का सामना करने का संदेश दिया, उसी तरह से बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय जैसे समाज सुधारक, ये सभी हिंदुत्व को ही आगे बढ़ा रहे थे.
बिपिन चंद्र पाल ने सोल ऑफ़ इंडिया नाम की पुस्तक लिखी तब उनका मक़सद हिंदुओं की चेतना को जागृत करना ही था. उन्होंने कहा था कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है. लेकिन उनके कहने का मतलब ये था कि भारत अपने कृतित्व से हिंदू राष्ट्र है ना कि संविधान के द्वारा.
हम सभी ने बड़े बुजुर्गो के द्वारा नक़ली "साधुओं" की कहानियाँ सुनी हैं। लेकिन वर्तमान दौर में इनके ख़िलाफ़ असली महात्मा क्यों चुप्पी साढ़े है पूरी दुनिया में हिंदू धर्म की छवि को नुक़सान पंहुचा रहे है।
हरिद्वार की '(अ)धर्म संसद' की तस्वीर।
राम राम! जय सीता राम! जय श्री कृष्णा! ॐ नमः शिवाय! जय भोले! जय श्री राम!…. जब भी हम कहीं जाते हैं, या कहीं आते हैं, या किसी से अगर मिलते हैं, या हम सोते हैं या जागते हैं, या खाना खा रहे होते हैं तब हम भगवान के इन नामों का स्मरण किया करते हैं। हिंदू धर्म में घंटियों, भजन-कीर्तनों का एक चलन रहा है जिन्हें पवित्र माना जाता है। हिंदुओं में कुछ अद्वैत हैं, कुछ माँ के प्रेमी हैं, कुछ श्रीकृष्ण भक्ति में लीन हैं, कुछ भोले बाबा के मानने वाले हैं, और हर गाँव औरशहर में हनुमान जी के भक्त मिलेंगे। हमारी प्रार्थना करने और मनाने के तरीकों की समृद्ध विविधता, हमारी संस्कृति और हमारी आत्मा के भीतर गहरे तक समाई हुई है।
पूरी दुनिया में कोई 1.5 अरब क़रीब हिंदू हैं, इसलिए कुछ लोगों का बदमाश और अपराधी होना लगभग अपरिहार्य ही है। है जानते है की कई बलात्कारी साधु जैसे राम रहीम,आशाराम बापू इनके जैसा घटिया साधु बहुत काम है आज के दौर में नए नए साधु आ रहे है आज नहीं तो कल इनका भी चिठ्ठा खुलेगा | "साधुओं" की चोरी, बलात्कार, लूट और नरसंहार के आह्वान की कहानियाँ देखी हैं। दुनिया में कोई भी पुरोहित बुरी चीजों से बचा नहीं है। वैसे लोग जो नरसंहार के लिए चिल्लाते रहते हैं, वे दरअसल दया के पात्र हैं जिन्हें स्पष्ट रूप से बहुत मदद की ज़रूरत है।
राजनेताओं के रूप में वे वही कर रहे हैं जो आज भारत में बिकता है- नफ़रत जाती धर्म एक कम क़ीमत वाली, और उच्च मात्रा वाली वो वस्तु बन चुकी है जिसका एक बड़ा तैयार मार्केट है। वे एक हद तक खुद को साधु कहते हैं, लेकिन हमें ऐसे लोगों के लिए सच में बुरा लगना चाहिए। महात्माओं और साधुओं के साथ एक अच्छा-ख़ासा समय बिताने के बाद भी मेरे मन में उन्हें लेकर कुछ द्वन्द नहीं हैं, कुछ भ्रम नहीं हैं। किसी अन्य व्यक्ति की तरह, सच्चिदानंद (भगवान) को प्राप्त करने के उनके भी अपने मार्ग हैं। ये लोग धर्म के नाम पर ब्यापार करते और हिन्दू धर्म को नुकसान पहुंचते है |
पिछले 5 सालों में बातचीत और सवालों के आधार पर,किया गया सर्वे :-
1) "यह सिर्फ एक हो-हल्ला है और जाहिर तौर पर हिंदू कृत्य नहीं है"
2) “हर कोई मेरे परिवार का हिस्सा है; मैं किसी की निंदा नहीं कर सकता"
3) "लोग गुस्से में हैं और हमें सावधान रहना चाहिए"
चिंता की बात यह है कि साधुओ की चुप्पी का कारनयह है की उनमे, कुछ लालची और डरपोक लोगों के द्वारा किए जा रहे हिंसा और रणनीतिक नफरत के कारन हिंदू धर्म कलंकित हो रहा है। वे त्यागी होने का ढोंग करते हैं- और चूंकि हिंदू, कुल मिलाकर, एक उदार और प्यार करने वाले लोग हैं, उनमें से बहुत से लोग यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि ऐसे लोगों की वेशभूषा वास्तविक है।
वे लोग जिन्होंने अपने विवेक (विवेक: सच्चाई और झूठ और जातिवाद ,धर्मवाद के बीच अंतर करने की क्षमता) को विकसित किया है, उन्हें इनके ख़िलाफ़ खड़ा होना चाहिए। हम आपको आवाज़ उठाने के लिए कहते हैं- हममें से बाकी लोगों की मदद करना आपका धर्म है जो नफरत के परिणामों से जूझ रहे हैं।
हिन्दू धर्म की सबसे घटिया पंक्ति जाती है जो आज के २१ सवी सदी में भी अच्छा रिसपॉन्स देखने को मिलता है |
गोस्वामी तुलसीदास जी- अपनी बेहद सुंदर और कम लोकप्रिय विनय पत्रिका में- अपने प्रिय राम भगवान से बात करते हैं- और वह शिकायत करते हैं कि कैसे शरीर और दुनिया के विभिन्न भ्रम और इच्छाएं उन्हें सत्य की खोज से दूर कर देती हैं (147: 2-4) (this section should be in Devanagari)
"Mile rahaim, maryau cahaim kamadi samkghati, mo binu rahaim na, meriyai jaraim chala chati.
Basata hiye hita jani maim sabaki ruci pali, kiyo kathakako danda haum jara karama kucali.
Dekhi suni na aju laum apanayati aisi, karahim sabai sira mere hi phiri parai anaisi."
हम अपने समय के सच्चे महात्माओं और साधुओं/साध्वियों से आह्वान करते हैं कि वे हम सभी के लिए एक्शन लें, आवाज़ उठाएँ -हिंदू धर्म क्या है, इसकी सच्चाई को जोर से और प्यार से बोलने के लिए, सुंदरता और उदारता को प्रेरित करने के लिए, और हमारे अभय और प्रेमपूर्ण संसार के आनंद का आह्वान करने के लिए कदम उठाइए।
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